" मेरी ज़ुबां "

- ओमराज पाण्डेय "ओमी"

शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

रंग बिरंगे बाग़ छोड़ के शहर की सड़कों पर गाये
कोयल पहने चोंच में छल्ला अल्हड़ राग सुनाये,
भौं-भौं, भौं-भौं, काला कुत्ता, दौड़  के  पीछे आये
भोर समय उठ बैठा कौआ रात का हाल सुनाये,
पेट में उठती भूख की गाथा सुन लो आज सुनायें
भ्रम जाल व्यर्थ के रुढ़िवाद, मुँह से कह न पायें....
                            - ओमराज पाण्डेय "ओमी"

शुक्रवार, 9 सितम्बर 2011

अपनी प्रियतमा की नगरी के अतिरिक्त कोई प्रेमी भला और कहाँ जा 


सकता है | अपनी ह्रदयकांक्षा के अतिरिक्त किसी आकांक्षी को भला और 


कहाँ शान्ति मिल सकती है | सच्चे प्रेमी के लिए पुनर्मिलन ही जीवन है 


और वियोग ही म्रत्यु, उसका ह्रदय आकुल व्याकुल रहता है | अपनी 


प्रियतमा के मिलन कक्ष तक शीघ्राति-शीघ्र पहुंचने के लिए वह शत-शत 


जीवनों का भी उत्सर्ग कर देगा |
                       ||गलती||




शाख  सूख   रही  पेंड़  की,  पेंड़   बेचारा   क्या  करता

जड़ की मिटटी साथ न देती,पेंड की इसमें क्या गलती

उड़ा  परिंदा  दूर  देश  को, रस्ते  में  क़यामत आती है

बुना  बसेरा  उजड़  गया,परिंदे की इसमें  क्या  गलती

हर   कोई  पीछे  भागे, दौलत  को  हाथ  में  करना  है

नसीब दौलत नहीं लिखी, दौलत की इसमें क्या गलती

जिसने  पाप  किये  है  जग  में, वो  जग  के  पापी  हैं

इस पाप को पाप न समझा,पाप की इसमें क्या गलती

उसूल  बनाये रब ने  ऐसे, जनम  हुआ  तो मरण भी है

जब मरना है सबको जग में,रब की इसमें क्या गलती
         

                      - ओमराज पाण्डेय “ओमी"

      || नसीब ||


डाली पे फूल खिले हँस-हँस कर 
काँटे रोये सिसक-सिसक कर 
मेरा पहरा, आठ पहर था 
कब ले गया माली फूल तोड़ कर, 
 
बेबस जीवन बेबस मन है 
रोती आँखें जर्जर तन है 
आज कहानी शबनम सी है 
तेरे बिन सूनापन है 
तुम रहना वहाँ खुश हो हो कर, 
मैं बैठा हूँ धूप में आँखें धो कर, 
 
जीवन कौड़ी भाव बिका है 
माली को कुछ नहीं नफ़ा है 
रात अँधेरी गुमसुम बैठा 
क्या सोच कर वो ख़फ़ा है 
फूल अधखिले कल खिल-खिल कर 
रब ने भेजा नसीब लिख-लिख कर 


गीतकार - ओमराज पाण्डेय "ओमी
"

||"लिखने वाले ने लिख दी, हम सब की तक़दीर"||


आया है, सो जायेगा, राजा रंक फ़क़ीर 
लिखने वाले ने लिख दी, हम सब की तक़दीर 
बुरा न सोचो, बुरा करो, न 
जीवन पथ पर कभी डरो न 
हम सब एक चैन की बंशी 
सुर बेसुरा तुम करो न 
आओ मिलकर गायें हम सब, राग भैरवी की ज़ंजीर, 
म ग', सा रे' सा, ध' नी' सा रे' ग', सा रे' सा.... 
आया है, सो जायेगा, राजा रंक फ़क़ीर 
लिखने वाले ने लिख दी, हम सब की तक़दीर ....
सुनेगा ऊपरवाला ये सब 
गाया किसने, कहाँ और कब 
निगाह पड़ेगी जब ज़मीं पर 
तब सोचेगा सारा नभ 
मिलजुल कर रहने वालों ने दे दी मुझको पीर 
आओ मिलकर गायें हम सब, राग भैरवी की ज़ंजीर, 
म ग', सा रे' सा, ध' नी' सा रे' ग', सा रे' सा.... 
आया है, सो जायेगा, राजा रंक फ़क़ीर 
लिखने वाले ने लिख दी, हम सब की तक़दीर..... 
                   - ओमराज पाण्डेय "ओमी"

: कन्नौजी लोकगीत:

रखिया लइके चली है बहिना

पीहर की सीध लगाइके,

उड़ी चिरइया, बोला कउआ,

भैय्या के द्वार पे जाइके,

काँव-काँव कउआ की सुन के,

बोला भैय्या द्वार पे जाइके

अरे बहिना हमरी आय गई

बादर गरजो, सावन बरसो

नाचई नदिया बीच हिलोरो

चंदन, वंदन, प्यार का बंधन

झुला सखियन के संग झूलो

खेत हार खलियन में जाइके

सुत छुटपन की आय गई

उड़ी चिरइया आस्मान में

लऊट के घर को आय गई

उड़ी चिरइया, उड़ी चिरइया

उड़ी चिरइया, बोला कउआ,

भैय्या के द्वार पे आइके

काँव-काँव कउआ की सुन के,

बोला भैय्या द्वार पे जाइके

अरे बहिना मोरी भाय गई

बहिना मोरी भाय गई.......
 
- ओमराज पाण्डेय "ओमी"

रविवार, 1 मई 2011

प्यार क्या है?

प्यार क्या है?
यह कब हुआ?

यह कहाँ जाता है?

यह कैसे विकसित होता है?

इसका मालिक कौन है?

आप इसके बारे में क्यों बात नहीं करते?

यह उपन्यास या कोई गैर है?

क्या यह दिल से होकर आया है?

लेकिन प्यार सच्चा है, प्रेम बोल्ड है

प्यार करने के लिए पकड़ कुछ कठिन है,

प्रेम कोमल और अच्छा भी है;

करने के लिए बर्फ की तरह पिघल जाता है .

प्यार दिल से दिल को जाता है.

प्यार हर किसी के द्वारा स्वामित्व में है.

प्यार हर कवि की भाषा है,

हर महत्वपूर्ण व्यक्ति,

और भी हर दूसरे व्यक्ति.

की प्रेम कथा है,

एक ही समय और गैर कल्पना में.

प्यार मन से आता है,

और यह पवित्र दिल से आता है.

सभी युवा लोगों को प्यार करता है,


कभी कभी यह लक्ष्य कठिन हो जाता है
प्यार मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है;

               -  ओमराज पाण्डेय "ओमी"